
एक अदना गीली मिट्टी सी थी मै
एक बेजान मामूली सी चीज़ थी मै
गर्दिशों में रहती थी मै
पानी के बहाव के साथ बहती गुजरती थी मै
तभी एक दिन मौला ने मुझे गीली मिट्टी से दिया बनाया
उसमे एक उजाले से भरा लौ जलाया
जिसे देख सारा जग जगमगाया
मौसम बहार का आया
फूलों ने खुशी से मुस्कुराया
पर न जाने कहाँ से तभी हुई एक ऐसी बरसात
उस रोशन लौ की रही न कोई बिसात
बिखर रही थी उसकी ज़ात
वो दिया तो भुझ गया
अदना सी मिट्टी में फिर से मिल गया
पर क्यू रोशन है जहान अभी भी
पता चला की दिखावे का तबस्सुम बचा है अभी
उदासी के सैकड़ों दियें जलते है सभी
अभी भी उस मौला के अंजुमन का अजब चिराग हूँ मै
ज़ख्मों पे ज़ख्म खा के भी खुशमिजाज़ हूँ मै
~~ स्तुति