जो पाया है वो खोना है।
है तू मुसाफिर कुछ बरसों का,
अंत समय मिट्टी में मिल जाना है।
डर है क्यूँ तुझको तन्हाइयों का,
सच्चा दिल ही तो अकेले रोता है।
न मोल है तेरे इन आंसुओं का,
क्यूँ वफ़ा की अर्जियें लगाता है।
भरोसा न कर इस निष्ठुर ज़माने का,
लोग दिलों में अंगारें लिए चलते है।
है खिलौना तू उस ख़ुदा के हाँथों का,
वो बेख़बर तुम्हे नचाता है।
एक दिन तो एहसास होगा तेरी इबादत का,
तुम पे इनायत उसे कर जाना है।
है दूर नहीं किनारा साहिल का,
कश्ती को तो पार लगाना है।
है मज़बूत इरादा जीतने का,
मुसीबतों को तो रुख़सत हो जाना है।
है रास्ता कठिन मंज़िल का,
पर इन हौसलों को ख़ुशनुमा अंजाम तो पाना है। :)
~~ स्तुति