Thursday, August 20, 2009

खाव्बों की दुनिया


खाव्बों की दुनिया ना जाने कहाँ से आई ये धुंधले बादलों की दुनिया
घनघोर अँधेरे में उजली किरण सी दुनिया
काले आकाश में चमकते तारों की दुनिया
रेतीले मैदान में हरयाली की दुनिया
अँधेरी रात में जगमगाते जुगनुओं की दुनिया
धूल भरी आंधी में महकते फूलों की दुनिया
झुलसाती धूप में रिमज़िम फुहारों की दुनिया
उफनाते तूफान में गहराईयों की दुनिया
सिसकियों में गूंजती हसी की दुनिया
सन्नाटे में मीठी आवाज़ की दुनिया
हार में हार को हराने की दुनिया
हताशा में आशाओं की दुनिया
दिलों में कितने अरमानो की दुनिया
ख्वाबों की दुनिया ...........
न जाने कितने अफसानो की दुनिया
न जाने कहाँ से आई ये धुंधले बादलों की दुनिया

~~ स्तुति

जो इस भूल में रहते है कि हम भाग्य से आगे बढ़ते है,
उन्हें नहीं मालूम कि भाग्य भी उन्ही के साथ चलता है जो मेहनत करते है|
दुनिया के इस दस्तूर कि क्या दुहाई दूँ ,
लोग मशहूर को मगरूर कहते है|
हर कदम पर लोगों कि नफरत भरी निगाहें
हमे पीछे मुड़ने को मजबूर करती है
इस बेदर्द दुनिया में किसे कहे अपना
अपने ही अपनों को ठोकर मारकर दूर करते है
ज़िन्दगी के मुश्किल दौर में किस पर करे भरोसा
हमदर्द ही मरहम कि जगह माहुर देते है
क्यूँ करूँ इस ज़िन्दगी से इतनी शिकायत
हम इस ज़िन्दगी का सम्मान करते है
कुछ तो है इस ज़िन्दगी में खास
तो क्यूँ हम अपनी ज़िन्दगी कि शाम करते है
क्यूँ डरे इस काटों भरी महफिलों से
हम तो फूलों के रंगों से गुलशन को गुलज़ार करते है
काले बादलों के सायों में क्या छिपना
हम तो रोशिनी से प्यार करते है
कोई हो या न हो हमारे साथ
हम तो अपनी खुशियों का आगाज़ करते है
कुछ कर गुजरने की चाह में
हम ज़मीन आसमान एक करते है
चुनौतियों से क्या सिहरना
हम परों से नहीं हौसलों से उड़न भरते है
दुखों से हमे क्या चुभन
हम तो खुशियों को अपने दामन में समेटे रहते है
मौत को ज़िन्दगी का आखिरी पयान कहने वालों
हम तो जिंदादिली को ज़िन्दगी का आयाम कहते है
अपने पैरों पर खड़े होने को
हम अपना मुकाम कहते है
भाग्य के भरोसे रहने वालों
हम तुम्हे नाकाम कहते है !!!


~~ स्तुति