Friday, October 9, 2009

एक रात जब ज़िन्दगी ने थामा मेरा हाँथ


एक रात जब ज़िन्दगी ने थामा मेरा हाँथ
और कुछ ऐसा कहा जो अभी तक है मुझे याद
उस रात का मंज़र कुछ अजीब था
कोई दोस्त न कोई रकीब था
ना कोई होश था ना मै माँमदहोश था
ना चाँद रोशन था न शमा ही जल रही थी
ना खामोशी थी ना आवाजे थी
तभी एक साया सा उभरा
हुबहू मेरा सा दिखता था
पर ना वो मै था ना वो मेरी परछाई थी
वो मेरे पास आने लगा
मै कुछ डरा सहमा घबराया
पर वो आगे बढ़ता रहा
उसने मेरा हाँथ थामा और मुझे अपनी तरफ खीचा
मेरे मुह से हलकी सी चीख निकली
और वो मुझे बादलों की ओर ले गया
झिलमिल सितारों के बीच ले गया
और मुझे और करीब ला के बोला
क्या तुम इस दुनिया की भीड़ में खोये हो!
क्यूँ इस डरपोक दुनिया की चाल से डरते हो?
क्यूँ रात के अँधेरे में सिसकते हो?
क्यूँ लोगों को मदद के लिए पुकारते हो?
क्यूँ इन ग़मों की शिकायते बेहिसाब करते हो?
क्यूँ हमेशा ख़ुशी से मुह मोड़ते हो?
क्यूँ औरों में अपने को तलाशते हो?
क्यूँ इन धुंधले बादलों में खुद चाँद नहीं ढूँढ़ते?
क्यूँ मंजिलों से नज़र हटा रास्तों में भटकते हो?
क्यूँ खुद को इतना तनहा लाचार समझते हो?
क्यूँ अपनी ज़िन्दगी को छोड़ मौत की राह पकड़ते हो?
लो अब थाम लो मेरा हाथ
ये साथ कभी ना छोड़ना
क्यूंकि इन अंधियारी रातों से दूर एक जहाँ और भी है
तारों चाँद से भरी एक निशा और भी है
यहीं कारवां थमता नहीं
चिडियों की चहकने से गूंजती
फूलों की खुशबुओं से महकती
तितलियों के रंगों से सजी
सूरज की रौशनी से नहाती
एक सुबह और भी है
ज़िन्दगी का हाँथ थामे
खुशियों को अपने दामन में समेटे
एक नयी स्तुति और भी है!!!! :)



~~ स्तुति

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर रचना
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    SANJAY
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  2. आपका बहुत बहुत धन्यवाद :)

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  3. उम्मीदें लरज रही हैं आपकी इस कविता में... इस नयी स्तुति को सदा नया ही बने रहना चाहिए.

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